“अगर सरदार पटेल न होते, तो आज भारत 562 टुकड़ों में बंटा होता!”
इस वाक्य में छुपा है एक ऐसा नाम, जिसने भारत की अखंडता को मजबूत नींव दी — Sardar Vallabhbhai Patel, जिन्हें दुनिया “लौहपुरुष” के नाम से जानती है।

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प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नाडियाड गाँव में जन्मे वल्लभभाई पटेल (Sardar Vallabhbhai Patel) एक साधारण किसान परिवार से थे। उनके पिता झवेरभाई एक स्वतंत्रता सेनानी थे और मां लाडबाई धार्मिक विचारों की थीं। वल्लभभाई बचपन से ही आत्मनिर्भर और दृढ़ निश्चयी थे। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और इंग्लैंड जाकर वकालत की डिग्री प्राप्त की।
वकालत से जनसेवा की ओर
इंग्लैंड से लौटने के बाद वल्लभभाई (Sardar Vallabhbhai Patel) ने अहमदाबाद में वकालत शुरू की और कुछ ही वर्षों में एक सफल वकील बन गए। लेकिन 1917 में महात्मा गांधी से प्रेरित होकर उन्होंने वकालत छोड़ दी और स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े।
खेड़ा और बारडोली आंदोलन: जननेता की पहली झलक
◾ खेड़ा सत्याग्रह (1918):
गुजरात के किसानों पर जबरन कर वसूली हो रही थी, तब सरदार पटेल ने गांधी जी के मार्गदर्शन में इस आंदोलन का नेतृत्व किया। अंग्रेजों को झुकना पड़ा और किसानों को कर में राहत मिली।
◾ बारडोली सत्याग्रह (1928):
जब अंग्रेजों ने बारडोली के किसानों पर भारी कर थोपा, तब पटेल ने शानदार नेतृत्व किया। अंग्रेज प्रशासन को झुकना पड़ा और तभी वहां की महिलाएं उन्हें ‘सरदार’ की उपाधि देने लगीं।
स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका Sardar Vallabhbhai Patel
वल्लभभाई पटेल कांग्रेस के मुख्य स्तंभों में से एक रहे। वे कई बार जेल गए, लेकिन उनका जोश कभी नहीं टूटा। 1931 में कराची अधिवेशन की अध्यक्षता करके उन्होंने कांग्रेस को आर्थिक-सामाजिक दृष्टि से भी नई दिशा दी।
भारत का एकीकरण: लौहपुरुष का ऐतिहासिक कार्य
562 रियासतों को एक भारत में मिलाया:
स्वतंत्रता के समय भारत में 562 देशी रियासतें थीं। विभाजन के समय जब कई रियासतें स्वतंत्र रहने या पाकिस्तान में शामिल होने की कोशिश कर रही थीं, तब पटेल ने अपने अद्वितीय कूटनीतिक कौशल और कठोर निर्णयों से लगभग सभी रियासतों को भारत में मिला दिया।
हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर जैसे जटिल मामलों को उन्होंने कुशलता से हल किया। इस योगदान ने उन्हें “भारत का बिस्मार्क” और “लौहपुरुष” बना दिया।
Sardar Vallabhbhai Patel – गृह मंत्री और उपप्रधानमंत्री के रूप में योगदान
आज़ादी के बाद वे भारत के पहले गृह मंत्री और उपप्रधानमंत्री बने। उन्होंने न केवल प्रशासनिक ढांचे को मजबूत किया बल्कि भारतीय सिविल सेवा (IAS) जैसी संस्थाओं को सुदृढ़ किया। उनका मानना था कि “एक मजबूत प्रशासन ही एक मजबूत राष्ट्र की नींव है।”
विचारधारा और व्यक्तित्व
सरदार पटेल का जीवन सादगी, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रभक्ति का अद्भुत उदाहरण है। वे शब्दों से नहीं, कर्मों से प्रेरणा देते थे। उनका नेतृत्व लोगों में आत्मविश्वास भरता था।
उनकी स्पष्ट सोच, समयबद्धता और निर्णय लेने की क्षमता उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाती थी।
निधन और अमर विरासत
15 दिसंबर 1950 को मुंबई में उनका निधन हुआ। उनके निधन के बाद देश ने एक महान सपूत खो दिया, लेकिन उनकी विरासत अमर है।
2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा “स्टैचू ऑफ यूनिटी“ — दुनिया की सबसे ऊँची प्रतिमा — सरदार पटेल को समर्पित की गई, जो उनकी विरासत को चिरस्थायी बनाती है।
प्रेरणा आज और कल के लिए
आज जब हम ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की बात करते हैं, तो सरदार पटेल की याद स्वतः आती है।
उन्होंने हमें सिखाया कि असंभव को संभव बनाना केवल इच्छाशक्ति की बात है।
निष्कर्ष:
सरदार वल्लभभाई पटेल केवल एक नेता नहीं थे, वे भारत की आत्मा में समाहित वह चेतना हैं, जो आज भी हमें एकता और दृढ़ता की सीख देती है।
उनकी विरासत को जानना, समझना और उसका सम्मान करना हर भारतीय का कर्तव्य है।
प्रेरणास्पद नारा:
“एकता ही शक्ति है!” – सरदार वल्लभभाई पटेल
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